गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

नव संवत्सर का अभिनंदन

नव संवत्सर का अभिनंदन 

चैत्र नवरात्र के साथ ही नव संवत्सर 
2070 की शुरूआत गुरूवार आज से हो गई । घंटे, घडियाल, शंखनाद के साथ माँ संतोषी मंदिर के पट खुले। इसी के साथ नए संवत्सर का अभिनंदन किया गया। 
आज मंदिर में स्वार्थ सिद्धि योग और शुभ मुहूर्त में घट स्थापना की जाएगी। मंदिर में माता को नया पंचांग पढ़कर सुनाया जाएगा। ज्योतिष आचार्यो के अनुसार गुरूवार को नवरात्र प्रारंभ होना श्रेष्ठ व समृद्धिकारक
रहेगा।

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

Navratra चैत्र नवरात्रा 11 अप्रैल 2013

11 अप्रैल 2013 के दिन से नव सम्वत्सर प्रारम्भ होगा. साथ ही इस दिन से चैत्र शुक्ल पक्ष का पहला नवरात्रा होने के कारण इस दिन कलश स्थापना भी की जायेगी. नवरात्रे के नौ दिनों में माता के नौ रुपों की पूजा करने का विशेष विधि विधान है. साथ ही इन दिनों में जप-पाठ, व्रत- अनुष्ठान, यज्ञ-दानादि शुभ कार्य करने से व्यक्ति को पुन्य फलों की प्राप्ति होती है. इस वर्ष में पहला नवरात्रा अश्विनि नक्षत्र में प्रारम्भ होगा, तथा ये नवरात्रे 19 अप्रैल 2013 तक रहेगें.
वैसे तो नवरात्र स्थापना और व्रत उपासक को स्वयं करना चाहिए, लेकिन सामथ्र्य और समय के अभाव में किसी प्रमुख अनुष्ठान में शामिल हो कर भी इसका फल प्राप्त किया जा सकता है। सामान्यतया कोई अपने अनुष्ठान में परिजनों के अलावा किसी बाहरी व्यक्ति को शामिल नहीं करता है, लेकिन मंदिरों में होने वाले बड़े अनुष्ठानों में सहभागिता की जा सकती है।
इसी क्रम में संतोषी माता के मंदिर में होने वाले अनुष्ठान में स्थापना से पूर्व मात्र एक नारियल रख कर आप भी नवरात्र अनुष्ठान में सहभागी हो सकते हैं और व्रत के फल पा सकते हैं।

नवरात्रों में माता की पूजा कैसे करें

नवरात्रों में माता की पूजा कैसे करें
Method of Worshiping Mata

नवरात्रों के विषय में मान्यता है कि देवता भी मां भगवती की पूजा किया करते है. नवरात्रों में मां भगवती के नौ विभिन्न रुपों की पूजा की जाती है. मां भगवती को शक्ति कहा गया है. नवरात्रों में नौ दिन क्रमश शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चन्द्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्ययायनी, कालरात्रि, मां गौरी और सिद्धिदात्रि की पूजा की जाती है.

प्रतिपदा तिथि में पूजा प्रारम्भ करना

नवरात्रों में माता की पूजा करने के लिये मां भगवती की प्रतिमा के सामने किसी बडे बर्तन में रेत भरकर उसमें जौ उगने के लिये रखे जाते है. इस के एक और पानी से भरा कलश स्थापित किया जाता है. कलश पर कच्चा नारियल रखा जाता है. कलश स्थापना के बाद मां भगवती की अंखंड ज्योति जलाई जाती है. यह ज्योति पूरे नौ नवरात्रे दिन रात जलती रहनी चाहिए.
सबसे पहले भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है. उसके बाद श्री वरूण देव, श्री विष्णु देव की पूजा की जाती है. शिव, सूर्य, चन्द्रादि नवग्रह की पूजा भी की जाती है.

प्रतिदिन पाठ करना

उपरोक्त देवताओं कि पूजा करने के बाद मां भगवती की पूजा की जाती है. नवरात्रों के दौरान प्रतिदिन उपवास रख कर दुर्गा सप्तशती और देवी का पाठ किया जाता है. इन दिनों में इन पाठों का विशेष महत्व है. माता दुर्गा को अनेक नामों से जाना जाता है. उसे ज्ञाना, क्रिया, नित्या, बलपर्दा, शुभ, निशुभं हरणी, महिषासुर मर्दनी, चंद-मुंड विनाशिनी, परमेश्वरी, ब्रह्मा, विष्णु और शिव को वरदान देने वाली भी कहा जाता है. इसके अतिरिक्त निम्न मंत्र का भी जाप किया जा सकता है.

या देवी सर्व भूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता
नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमो नम: ।।

नवरात्रे में नवग्रह शात्नि पूजा विधि
Navgrah Shastri Puja Method on Navratri

नवरात्रि के नौ दिनों में नौ ग्रहों की शान्ति पूजा की जाती है. प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शान्ति हेतू पूजा की जाती है. द्वितीया तिथि के दिन राहू ग्रह की शान्ति पूजा की जाती है. तृ्तिया के दिन बृ्हस्पति के दिन, चतुर्थी के दिन शनि ग्रह, पंचमी के दिन बुध, षष्ठी के दिन केतु, सप्तमी के दिन शुक्र, अष्टमी के दिन सूर्य व नवमी के दिन चन्द्र देव की शान्ति पूजा की जाती है.
यह शान्ति क्रिया शुरु करने से पहले कलश की स्थापना और माता की पूजा करनी चाहिए. पूजा के बाद लाल वस्त्र पर एक यंत्र बनाया जाता है. इस यंत्र में नौ खाने बनाये जाते है. पहले तीन खानों में उसमें बुध, शुक्र, चन्द्र, बीच में गुरु, सुर्य, मंगल और नीचे के खानों में केतु, शनि, राहू को स्थान दिया जाता है.
इसके बाद नवग्रह बीच मंत्र की पूजा की जाती है. इसके बाद नवग्रह शात्नि संकल्प लिया जाता है. इसके बाद दिन अनुसार ग्रह के मंत्र का जा किया जाता है.
ग्रहों के मंत्र इस प्रकार है.

सूर्य बीज मंत्र - ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:
चन्द्र बीज मंत्र - ऊँ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्रमसे नम:
मंगल बीज मंत्र- ऊँ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:
बुध बीज मंत्र - उँ ब्रां ब्रीं ब्रौ स: बुधाय नम:
गुरु बीज मंत्र - ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:
शुक्र बीज मंत्र - ऊँ द्रां द्रीं द्रौ स: शुक्राय नम:
शनि बीज मंत्र - ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:
राहू बीज मंत्र - उँ भ्रां भ्रीं भौं स: राहुवे नम:
केतु बीज मंत्र - उँ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:

दुर्गासप्तशती में सात सौ महामंत्र होने से इसे सप्तशती कहते है. सप्तशती उपासना से असाध्य रोग दूर होते है. और आराधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है.

नवरात्रों में ध्यान देने योग्य बातें
Important things to be Kept in Mind During Navratri

नवरात्रों की पूजा करते समय ध्यान देने योग्य यह विशेष बात है कि एक ही घर में तीन शक्तियों की पूजा नहीं करनी चाहिए. देगी को कनेर और सुगन्धित फूल प्रिय है. इसलिये पूजा के लिये इन्ही फूलों का प्रयोग करें, कलश स्थापना दिन में ही करें, मां की प्रतिमा को लाल वस्त्रों से ही सजायें. साधना करने वाले को लाल वस्त्र या गर्म आसन पर बैठकर पूजा करनी चाहिए.

उपवासक को क्या नहीं करना चाहिए
Things Should be Avoided by those Who Fast

नवरात्रों का व्रत करने वाले उपवासक को दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन करना चाहिए. मांस, मदिरा का त्याग करना चाहिए. इसके अतिरिक्त नवरात्रों में बाल कटवाना, नाखून काटना आदि कार्य भी नहीं करने चाहिए. ब्रह्मचार्य का पूर्णत: पालन करना चाहिए. नवरात्रे की अष्टमी या नवमी के दिन दस साल से कम उम्र की नौ कन्याओं और एक लडके को भोजन करा कर साथ ही दक्षिणा देनी चाहिए.
लडके को भैरव का रुप माना जाता है. कंजनों को भोजन करवाने से एक दिन पूर्व रात्रि को हवन कराना विशेष शुभ माना जाता है. कंजकों को भोजन करवाने के बाद उगे हुए जौ और रेत को जल में विसर्जित कर दिया जाता है. कुछ जौं को जड सहित उखाडकर समृ्द्धि हेतू घर की तिजौरी या धन रखने के स्थान पर रखना चाहिए.
कलश के पानी को पूरे घर में छिडक देना चाहिए. इससे घर से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है. और नारियल को माता दुर्गा के प्रसाद स्वरुप खा लिया जाता है.

नवरात्रा पूजन प्रारम्भ विधि
Method of Beginning Navratri Puja

नवरात्रे चैत्र मास के हो, या फिर शारदीय नवरात्रे हो, दोनों ही में प्रतिपदा तिथि के दिन कलश स्थापना कि जाती है. कलश स्थापना करने से भी पहले उपवासक को नवरात्रे व्रत का संकल्प लिया जाता है. कलश से संबन्धित एक मान्यता के अनुसार कलश को भगवान श्री गणेश का प्रतिरुप माना गया है. इसलिये सबसे पहले कलश का पूजन किया जाता है.
कलश स्थापना करने से पहले भूमि को गंगा जल छिडकर शुद्ध किया जाता है. भूमि शुद्ध करने के लिये गाय का गोबर भी प्रयोग किया जा सकता है. पूजा में सभी नदियों, समुद्रों, नवग्रहों, दिशापालकों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी को आमंत्रित किया जाता है. पांच प्रकार के पत्तों से कलश को सजाया जाता  
सर्वप्रथम श्री गणेश का पूजन
प्रतिपदा तिथि के दिन नवरात्रे पूजा शुरु करने से पहले कलश स्थापना जिसे घट स्थापना के नाम से भी जाना जाता है. हिन्दू धर्म में देवी पूजन का विशेष महात्मय है. इसमें नौ दिनों तक व्रत-उपवास कर, नवें दिन दस वर्ष की कन्याओं का पूजन और उन्हें भोजन कराया जाता है.

शुभ मुहूर्त में घट स्थापना

सभी धार्मिक तीर्थ स्थलों में इस दिन प्रात: सूर्योदय के बाद शुभ मुहूर्त समय में घट स्थापना की जाती है. नवरात्रे के पहले दिन माता दुर्गा, श्री गणेश देव की पूजा की जाती है. इस दिन मिट्टी के बर्तन में रेत-मिट्टी डालकर जौ-गेहूं आदि बीज डालकर बोने के लिये रखे जाते है.
भक्त जन इस दिन व्रत-उपवास तथा यज्ञ आदि का संकल्प लेकर माता की पूजा प्रारम्भ करते है. नवरात्रे के पहले दिन माता के शैलपुत्री रुप की पूजा की जाती है. जैसा की सर्वविदित है, माता शैलपुत्री, हिमालय राज जी पुत्री है, जिन्हें देवी पार्वती के नाम से भी जाना जाता है. नवरात्रों में माता को प्रसन्न करने के लिये उपवास रखे जाते है. तथा रात्रि में माता दुर्गा के नाम का पाठ किया जाता है. इन नौ दिनों में रात्रि में जागरण करने से भी विशेष शुभ फल प्राप्त होते है. 

चैत्र पक्ष पहला नवरात्रा - घट स्थापना विधि

शारदीय नवरात्रा का प्रारम्भ आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापन के साथ होता है. कलश को हिन्दु विधानों में मंगलमूर्ति गणेश का स्वरूप माना जाता है अत: सबसे पहले कलश की स्थान की जाती है. कलश स्थापन के लिए भूमि को सिक्त यानी शुद्ध किया जाता है. भूमि की सुद्धि के लिए गाय के गोबर और गंगाजल से भूमि को लिपा जाता है. विधान के अनुसार इस स्थान पर सात प्रकार की मिट्टी को मिलाकर एक पीठ तैयार किया जाता है, अगर सात स्थान की मिट्टी नहीं उपलब्ध हो तो नदी से लायी गयी मिट्टी में गंगोट यानी गांगा नदी की मिट्टी मिलाकर इस पर कलश स्थापित किया जा सकता है.
कलश में सप्तमृतिका यानी सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेट किया जाता है और पंच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित किया जाता है. इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है "जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते". इसी मंत्र जाप से साधक के परिवार को सुख, सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद प्राप्त होता है. 

कलश स्थापना के बाद देवी प्रतिमा स्थापित करना

कलश स्थापना के बाद देवी प्रतिमा स्थापित करना देवी दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है और उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है और बायीं ओर कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी रहती है.

चुंकि भगवान शंकर की पूजा के बिना कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है. अत: भगवान भोले नाथ की भी पूजा भी की जाती है. प्रथम पूजा के दिन "शैलपुत्री" के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती है. इस प्रकार दुर्गा पूजा की शुरूआत हो जाती है प्रतिदिन संध्या काल में देवी की आरती होती है. आरती में "जग जननी जय जय" और "जय अम्बे गौरी" के गीत भक्त जन गाते हैं.


नवरात्रों में किस दिन करें किस ग्रह की शान्ति

नवरात्र में नवग्रह शांति की विधि:-

यह है कि प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शांति करानी चाहिए.
द्वितीय के दिन राहु ग्रह की शान्ति करने संबन्धी कार्य करने चाहिए.
तृतीया के दिन बृहस्पति ग्रह की शान्ति कार्य करना चाहिए.
चतुर्थी के दिन व्यक्ति शनि शान्ति के उपाय कर स्वयं को शनि के अशुभ प्रभाव से बचा सकता है.
पंचमी के दिन बुध ग्रह,
षष्ठी के दिन केतु
सप्तमी के दिन शुक्र
अष्टमी के दिन सूर्य
एवं नवमी के दिन चन्द्रमा की शांति कार्य किए जाते है.

किसी भी ग्रह शांति की प्रक्रिया शुरू करने से पहले कलश स्थापना और दुर्गा मां की पूजा करनी चाहिए. पूजा के बाद लाल वस्त्र पर नव ग्रह यंत्र बनावाया जाता है. इसके बाद नवग्रह बीज मंत्र से इसकी पूजा करें फिर नवग्रह शांति का संकल्प करें.
प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शांति होती है इसलिए मंगल ग्रह की फिर से पूजा करनी चाहिए. पूजा के बाद पंचमुखी रूद्राक्ष, मूंगा अथवा लाल अकीक की माला से 108 मंगल बीज मंत्र का जप करना चाहिए. जप के बाद मंगल कवच एवं अष्टोत्तरशतनाम का पाठ करना चाहिए. राहू की शांति के लिए द्वितीया को राहु की पूजा के बाद राहू के बीज मंत्र का 108 बार जप करना, राहू के शुभ फलों में वृ्द्धि करता है.

नवरात्रों में किस देव की पूजा करें.

नवरात्र में मां दुर्गा के साथ-साथ भगवान श्रीराम व हनुमान की अराधना भी फलदायी बताई गई है. सुंदरकाण्ड, रामचरित मानस और अखण्ड रामायण से साधक को लाभ होता है. शत्रु बाधा दूर होती है. मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. नवरात्र में विघि विधान से मां का पूजन करने से कार्य सिद्ध होते हैं और चित्त को शांति मिलती है.
माता के नौ रुप

Nine Incarnation of Goddess

नवरात्रो में माता के नौ रुपों कि पूजा की जाती है. नौ देवीयों के नाम इस प्रकार है. प्रथम-शैलपुत्री, दूसरी-ब्रह्मचारिणी, तीसरी-चन्द्रघंटा, चौथी-कुष्मांडा, पांचवी-स्कंधमाता, छठी-कात्यायिनी, सातवीं-कालरात्री, आठवीं-महागौरी, नवमीं-सिद्धिदात्री.

पहले दिन माता शैलपुत्री पूजन,

नवरात्रि पूजन  के पहले दिन मां दुर्गा के पहले स्वरूप माता शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। ये ही नवदुर्गाओं  में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वत राज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। नवरात्र पूजन में प्रथम दिन इन्हीं की पूजा व उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को 'मूलाधरÓ चक्र में स्थित करते हैं और यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ भी होता है।

वृषभ सवार शैलपुत्री माताजी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बांए हाथ में कमल- पुष्प सुशोभित है। अपने पूर्वजन्म में ये प्रजापति दक्ष के घर की कन्या के रूप में उत्पन्न हुईं थीं। तब इनका नाम 'सतीÓ था और इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया जिसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना- अपना यज्ञ- भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया। किन्तु दक्ष ने शंकरजी को इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यन्त विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं तो वहां जाने के लिए उनका मन व्याकुल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई।

सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा - प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को आमंत्रित किया है। उनके यज्ञ- भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु जान- बूझकर हमें नहीं बुलाया है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहां जाना किसी भी प्रकार श्रेयस्कर नहीं होगा। शंकरजी के इस उपदेश से सती को कोई बोध नहीं हुआ और पिता का यज्ञ देखने, माता- बहनों से मिलने की इनकी व्यग्रता किसी भी प्रकार कम न हुई। उनका प्रबल आग्रह देखकर अंतत: शंकरजी ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे ही दी।

सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल सती की माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे। परिजनों के इस व्यवहार से सती के मन को बहुत क्लेश पहुँचा। सती ने जब देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकर जी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है और दक्ष ने भी उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन कहे। यह सब देखकर सती का ब्रदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा और उन्होंने सोचा भगवान शंकर जी की बात न मान, यहां आकर मैने बहुत बड़ी भूल की है। सती अपने पति भगवान शंकर जी का अपमान न सह सकीं और उन्होंने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगग्नि द्वारा भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दु:खद समाचार को सुनकर शंकरजी ने अतिक्रुद्ध होकर अपने गणों को भेजकर दक्ष के यज्ञ का पूर्णतया: विध्वंस करा दिया।

सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे "शैलपुत्री" नाम से विख्यात हुईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद की कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व- भंजन किया था। "शेलपुत्री" देवी का विवाह भी शंकरजी से ही हुआ। पूर्वजन्म की ही भांति वे इस बार भी शिवजी की ही अर्धांगिनी बनीं। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत हैं।

द्वितीया तिथि माता के ब्रह्माचारिणी रुप की पूजा

 

द्वितीया तिथि के उपवास के दिन माता के दूसरे रुप देवी ब्रह्मचारिणी के रुप की उपासना की जाती है. माता ब्रह्माचारिणी का रुप उनके नाम के अनुसार ही तपस्विनी जैसा है. एक मान्यता के अनुसार दुर्गा पूजा में नवरात्रे के नौ दिनों तक देवी धरती पर रहती है. इन दिनों में साधना करन अत्यन्त उतम रहता है. माता ब्रह्माचारिणी को अरुहूल का फू और कमल बेहद प्रिय है. इन फूलों की माला माता को इस दिन पहनाई जाती है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 तृ्तीया तिथि माता के चन्द्राघंटा रुप की पूजा


दूर्गा पूजा के तीसरे दिन माता के तीसरे रुप चन्द्रघंटा रुप की पूजा की जाती है. देवी चन्द्रघंटा सभी की बाधाओं, संकटों को दुर करने वाली माता है. सभी देवीयों में देवी चन्द्रघंटा को आध्यात्मिक और आत्मिक शक्तियों की देवी कहा गया है. जो व्यक्ति इस देवी की श्रद्धा व भक्ति भाव सहित पूजा करता है. उसे माता का आशिर्वाद प्राप्त होता है.
तृ्तीया तिथि के दिन माता चन्द्राघंटा की पूजा जिस स्थान पर की जाती है. वहां का वातावरण पवित्र ओर शुद्ध हो जाता है. वहां से सभी बाधाएं दुर होती है. वर्ष 2013 में तृ्तीया तिथि का क्षय रहेगा. इस कारण माता के इस रुप की पूजा भी चतुर्थी तिथि के दिन की जायेगी. 




 

 

 

 

 

चतुर्थी तिथि माता के कुष्मांडा रुप की पूजा


देवी कुष्मांडा माता का चौथा रुप है. आश्चिन मास की चतुर्थी तिथि को माता के इसी रुप की पूजा की जाती है. देवी कुष्मांडा आंठ भुजाओं वाली है. इसलिये इन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है. मता कुष्माण्डा के आंठवें हाथ में कमल फूल के बीजों की माला होती है. यह माला भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली कही गई है. पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ जो जन माता के इस रुप की पूजा करते है. उन जनों के सभी प्रकार के कष्ट, रोग, शोक का नाश होता है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 पंचमी तिथि माता के स्कन्द देवी रुप की पूजा


पंचमी तिथि को माता स्कन्द देवी की पूजा की जाती है. नवरात्रे के पांचवे दिन कुमार कार्तिकेय की माता की पूजा भी की जाती है. कुमार कार्तिकेय को ही स्कन्द कुमार के नाम से भी जाना जाता है. इसलिये इस दिन कुमार कार्तिकेय की माता की पूजा आराधना करना शुभ कहा गया है. जो भक्त माता के इस स्वरुप की पूजा करते है, मां उसे अपने पुत्र के समान स्नेह करती है. देवी की कृ्पा से भक्तों की मुराद पूरी होती है. और घर में सुख, शान्ति व समृ्द्धि वृ्द्धि होती है

 

 

 

 

 

 

 

 

 षष्ठी तिथि माता के कात्यायनी देवी रुप की पूजा


माता का छठा रुप माता कात्यायनी के नाम से जाना जाता है. ऋषि कात्यायन के घर जन्म लेने के कारण इनका नाम कात्यायनी पडा. माता कात्ययानी ने ही देवी अंबा के रुप में महिषासुर का वध किया था. नवरात्रे के छठे दिन इन्हीं की पूजा कि जाती है. इनकी पूजा करने से भक्तों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है.
निस्वार्थ भाव से माता की इस दिन पूजा करने से निर्बल भी बलवान बनता है. व भक्तजन को अपने शत्रुओ पर विजय प्राप्त होती है. इस माता की पूजा गोधूली बेला में की जाती है.

 

 

 

 

 

 

 

 

  सप्तमी तिथि माता के कालरात्रि रुप की पूजा


तापसी गुणों स्वरुपा वाली मां कालरात्रि की पूजा की जाती है. माता के सांतवें रुप को माता कालरात्रि के नाम से जाना जाता है. देवी का यह रुप ऋद्धि व सिद्धि प्रदान करने वाला कहा गया है. यह तांत्रिक क्रियाएं करने वाले भक्तों के लिये विशेष कहा गया है. दुर्गा पूजा मेम सप्तमी तिथि को काफी महत्व दिया गया है. इस दिन से भक्त जनों के लिये देवी मां का दरवाजे खुल जाते है. और भक्तों की भीड देवी के दर्शनों हेतू जुटने लगती है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

   अष्टमी तिथि माता के महागौरी रुप की पूजा


माता का आंठवा रुप माता महागौरी का है. एक पौराणिक कथा के अनुसार शुभ निशुम्भ से पराजित होने के बाद गंगा के तट पर देवता माता महागौरी की पूजा कर रहे थे, और राक्षसों से रक्षा करने की प्रार्थना कर रहे थे, इसके बाद ही माता का यह रुप प्रकट हुआ और देवताओं की रक्षा हुई. इस माता के विषय में यह मान्यता है कि जो स्त्री माता के इस रुप की पूजा करती है, उस स्त्री का सुहाग सदैव बना रहता है. कुंवारी कन्या पूजा करें, तो उसे योग्य वर की प्राप्ति होती है. साथ ही जो पुरुष माता के इस रुप की पूजा करता है, उसका जीवन सुखमय रहता है. माता महागौरी अपने भक्तों को अक्षय आनन्द ओर तेज प्रदान करती है.

 

 

 

 

 

 

 

नवमी तिथि माता के सिद्धिदात्री रुप की पूजा


भक्तों का कल्याण करने के लिये माता नौ रुपों में प्रकट हुई. इन नौ रुपों में से नवम रुप माता सिद्धिदात्री का है. यह देवी अपने भक्तोम को सारे जगत की रिद्धि सिद्धि प्रदान करती है. माता के इन नौ रुपों की न केवल मनुष्य बल्कि देवता, ऋषि, मुनि, सुर, असुर, नाग सभी उनके आराधक है. माता सिद्धिदात्री अपने भक्तों के रोग, संताप व ग्रह बधाओं को दुर करने वाली कही गई है.

इस प्रकार नवरात्रों के नौ दिनों में माता के अलग अलग रुपों की पूजा की जाती है. 
(साभार संकलन : राहुल )

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

Ajmer यहां आकर आपकी तलाश खत्म होती है।


अगर आप अपने और अपनों के संकट निवारण कर काम की सफलता और मनोरथ पूर्ण करने के लिए प्रयासरत हैं? अगर किसी ऐसे दिव्य साधन की खोज मेंं हैं जो ्रबिना किसी प्रपंच, बिना किसी खर्च और बहुत कम समय में केवल प्रार्थना और दर्शन मात्र से अपना प्रभाव दिखा सके तो यहां आकर आपकी तलाश खत्म होती है।
माता का नाम और परिचय ही सन्तोषी है, इसीलिए माता अपने भक्तों के बहुत ही कम प्रयास में भी संतुष्ठ होती है और मनोरथ पूरे करती है। अगर आप सच्चे मन से अपनी इच्छा मां के सामने प्रकट करते हैं और केवल प्रार्थना, पाठ और नियमित दर्शन करते हैं तो कठिन व्रत उपवास हमेशा जरूरी नहीं होता। ऐसा मेरा निजी अनुभव है। आप भी करके देखिए...
करना बस इतना है कि अपने लक्ष्य को पाने के लिए उसे प्रार्थना की तरह बार-बार दोहराइए। कहते हैं 24 घंटे में एक समय ऐसा अवश्य आता है जब जबान पर मां शारदा वास करती है और उस समय कही गई बात पूरी होती है। यह शुभ बेला आए इसके लिए केवल मां संतोषी की चालिसा का पाठ अपने आप में पूरी स्तुति और पाठ है। यह चालिसा आप को इसी ब्लॉग में मिल जाएगी। यह माता की साइट पर भीे उपलब्ध है।
इसके बाद आता है दर्शन... तो यह और भी आसान है। यहां ब्लॉग पर माता की छवि है ही, वरना यह किसी भी धार्मिक छवि की दुकान पर मिल सकती है।
यह उपाय आप कहीं भी रहते हुए कर सकते हैं। माता बहुत भोली है...और संतोषी तो है ही। ऐक बार माँ को अपना कष्ठ कह कर तो देखिए और महसूस कीजिए कि निवारण कितना जल्दी और सरल होता है।
अगर आप अजमेर शहर या आसपास रहते हैं तो आपका लक्ष्य बहुत ही आसान है सीधे मंदिर आइए और केवल दर्शन मात्र से मनोरथ पूर्ण करिए। यह मंदिर अजमेर के वैशाली नगर में है, और इतना सिद्ध और प्रसिद्ध है कि किसी से भी पूछेंगे तो वह बता देगा।
(यह बिना किसी स्वार्थ के केवल जनहित में प्रसारित है- राहुल)

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

संतोषी माता शुक्रवार व्रत कथा मूल हिन्दी पाठ

संतोषी माता की शुक्रवार व्रत कथा का हिंदी मूल पाठ विशेष कर विदेशों में रह रहे उन भक्तों के लिए 'गूगल' के सहयोग से इस ब्लाग पर दिया जा रहा है, जिन्हें वहां यह आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता।
संतोषी माता शुक्रवार व्रत कथा

एक बुढिय़ा थी, उसके सात बेटे थे। छह कमाने वाले थे। एक निक्कमा था। बुढिय़ा मां छहो बेटों की रसोई बनाती, भोजन कराती और कुछ झूटन बचती वह सातवें को दे देती थी, परन्तु वह बड़ा भोला-भाला था, मन में कुछ विचार नहीं करता था। एक दिन वह बहू से बोला- देखो मेरी मां को मुझ पर कितना प्रेम है। वह बोली-क्यों नहीं, सबका झूठा बचा हुआ जो तुमको खिलाती है। वह बोला- ऐसा नहीं हो सकता है। मैं जब तक आंखों से न देख लूं मान नहीं सकता। बहू ने हंस कर कहा- देख लोगे तब तो मानोगे?

कुछ दिन बात त्यौहार आया, घर में सात प्रकार के भोजन और चूरमे के लड्डू बने। वह जांचने को सिर दुखने का बहाना कर पतला वस्त्र सिर पर ओढ़े रसोई घर में सो गया, वह कपड़े में से सब देखता रहा। छहों भाई भोजन करने आए। उसने देखा, मां ने उनके लिए सुन्दर आसन बिछा नाना प्रकार की रसोई परोसी और आग्रह करके उन्हें जिमाया। वह देखता रहा। छहों भोजन कर उठे तब मां ने उनकी झूंठी थालियों में से लड्डुओं के टुकड़े उठाकर एक लड्डू बनाया। जूठन साफ कर बुढिय़ा मां ने उसे पुकारा- बेटा, छहों भाई भोजन कर गए अब तू ही बाकी है, उठ तू कब खाएगा? वह कहने लगा- मां मुझे भोजन नहीं करना, मै अब परदेस जा रहा हूं। मां ने कहा- कल जाता हो तो आज चला जा। वह बोला- हां आज ही जा रहा हूँ । यह कह कर वह घर से निकल गया। चलते समय स्त्री की याद आ गई। वह गौशाला में कण्डे थाप रही थी।

वहां जाकर बोला-दोहा- हम जावे परदेस आवेंगे कुछ काल। तुम रहियो संन्तोष से धर्म आपनो पाल।

वह बोली- जाओ पिया आनन्द से हमारो सोच हटाय। राम भरोसे हम रहें ईश्वर तुम्हें सहाय।

दो निशानी आपनी देख धरूं में धीर। सुधि मति हमारी बिसारियो रखियो मन गम्भीर।

वह बोला- मेरे पास तो कुछ नहीं, यह अंगूठी है सो ले और अपनी कुछ निशानी मुझे दे। वह बोली- मेरे पास क्या है, यह गोबर भरा हाथ है। यह कह कर उसकी पीठ पर गोबर के हाथ की थाप मार दी। वह चल दिया, चलते-चलते दूर देश पहुंचा। वहां एक साहूकार की दुकान थी। वहां जाकर कहने लगा- भाई मुझे नौकरी पर रख लो। साहूकार को जरूरत थी, बोला- रह जा। लड़के पूछा- तनखा क्या दोगे? साहूकार ने कहा- काम देख कर दाम मिलेंगे। साहूकार की नौकरी मिली, वह सुबह ७ बजे से १० बजे तक नौकरी बजाने लगा। कुछ दिनों में दुकान का सारा लेन-देन, हिसाब-किताब, ग्राहकों को माल बेचना सारा काम करने लगा। साहूकार के सात-आठ नौकर थे, वे सब चक्कर खाने लगे, यह तो बहुत होशियार बन गया। सेठ ने भी काम देखा और तीन महीने में ही उसे आधे मुनाफे का हिस्सेदार बना लिया। वह कुछ वर्ष में ही नामी सेठ बन गया और मालिक सारा कारोबार उस छोड़कर चला गया।

अब बहू पर क्या बीती? सो सुनों, सास ससुर उसे दु:ख देने लगे, सारी गृहस्थी का काम कराके उसे लकड़ी लेने जंगल में भेजते। इस बीच घर के आटे से जो भूसी निकलती उसकी रोटी बनाकर रख दी जाती और फूटे नारियल की नारेली मे पानी। इस तरह दिन बीतते रहे। एक दिन वह लकड़ी लेने जा रही थी, रास्ते मे बहुत सी स्त्रियां संतोषी माता का व्रत करती दिखाई दी। वह वहां खड़ी होकर कथा सुनने लगी और पूछा- बहिनों तुम किस देवता का व्रत करती हो और उसकेकरने से क्या फल मिलता है? इस व्रत को करने की क्या विधि है? यदि तुम अपने इस व्रत का विधान मुझे समझा कर कहोगी तो मै तुम्हारा बड़ा अहसान मानूंगी। तब उनमें से एक स्त्री बोली- सुनों, यह संतोषी माता का व्रत है। इसके करने से निर्धनता, दरिद्रता का नाश होता है। लक्ष्मी आती है। मन की चिन्ताएं दूर होती है। घर में सुख होने से मन को प्रसन्नता और शान्ति मिलती है। निपूती को पुत्र मिलता है, प्रीतम बाहर गया हो तो शीध्र घर आवे, कवांरी कन्या को मन पसंद वर मिले, राजद्वारे में बहुत दिनों से मुकदमा चल रहा हो खत्म हो जावे, कलह क्लेश की निवृति हो सुख-शान्ति हो। घर में धन जमा हो, पैसा जायदाद का लाभ हो, रोग दूर हो जावे तथा और जो कुछ मन में कामना हो सो सब संतोषी माता की कृपा से पूरी हो जावे, इसमें संदेह नहीं।

वह पूछने लगी- यह व्रत कैसे किया जाए यह भी बताओ तो बड़ी कृपा होगी। वह कहने लगी- सवा आने का गुड़ चना लेना, इच्छा हो तो सवा पांच आने का लेना या सवा रुपए का भी सहूलियत के अनुसार लेवे। बिना परेशानी और श्रध्दा व प्रेम से जितना भी बन पड़े सवाया लेना। प्रतयेक शुक्रवार को निराहार रह कर कथा सुनना,इसके बीच क्रम टूटे नहीं, लगातार नियम पालन करना, सुनने वाला कोई न मिले तो धी का दीपक जला उसके आगे या जल के पात्र को सामने रख कर कथा कहना, परन्तु नियम न टूटे। जब कार्य सिद्ध न हो नियम का पालन करना और कार्य सिद्ध हो जाने पर व्रत का उद्यापन करना। तीन मास में माता फल पूरा करती है। यदि किसी के ग्रह खोटे भी हों, तो भी माता वर्ष भर में कार्य सिद्ध करती है, फल सिद्ध होने पर उद्यापन करना चाहिए बीच में नहीं। उद्यापन में अढ़ाई सेर आटे का खाजा तथा इसी परिमाण से खीर तथा चने का साग करना। आठ लड़कों को भोजन कराना, जहां तक मिलें देवर, जेठ, भाई-बंधु के हों, न मिले तो रिश्तेदारों और पास-पड़ौसियों को बुलाना। उन्हें भोजन करा यथा शक्ति दक्षिणा दे माता का नियम पूरा करना। उस दिन घर में खटाई न खाय।

यह सुन बुढिय़ा के लडके की बहू चल दी। रास्ते में लकड़ी के बोझ को बेच दिया और उन पैसों से गुड़-चना ले माता के व्रत की तैयारी कर आगे चली और सामने मंदिर देखकर पूछने लगी-'यह मंदिर किसका है? सब कहने लगे संतोषी माता का मंदिर है, यह सुनकर माता के मंदिर में जाकर चरणों में लोटने लगी। दीन हो विनती करने लगी- मां में निपट अज्ञानी हूं, व्रत के कुछ भी नियम नहीं जानती, मैं दु:खी हूं, हे माता जगत जननी मेरा दु:ख दूर कर मैं तेरी शरण में हूं। माता को दया आई - एक शुक्रवार बीता कि दूसरे को उसके पति का पत्र आया और तीसरे शुक्रवार को उसका भेजा हुआ पैसा आ पहुंचा। यह देख जेठ-जिठानी मुंह सिकोडऩे लगे। इतने दिनों में इतना पैसा आया, इसमें क्या बड़ाई? लड़के ताने देने लगे- काकी के पास पत्र आने लगे, रुपया आने लगा, अब तो काकी की खातिर बढ़ेगी, अब तो काकी बोलने से भी नहीं बोलेगी। बेचारी सरलता से कहती- भैया कागज आवे रुपया आवे हम सब के लिए अच्छा है। ऐसा कह कर आंखों में आंसू भरकर संतोषी माता के मंदिर में आ मातेश्वरी के चरणों में गिरकर रोने लगी। मां मैने तुमसे पैसा कब मांगा है। मुझे पैसे से क्या काम है? मुझे तो अपने सुहाग से काम है। मै तो अपने स्वामी के दर्शन मांगती हूं। तब माता ने प्रसन्न होकर कहा-जा बेटी, तेरा स्वामी आवेगा। यह सुनकर खुशी से बावळी होकर घर में जा काम करने लगी।

अब संतोषी मां विचार करने लगी, इस भोली पुत्री को मैने कह तो दिया कि तेरा पति आवेगा, कैसे? वह तो इसे स्वप्न में भी याद नहीं करता। उसे याद दिलाने को मुझे ही जाना पड़ेगा। इस तरह माता जी उस बुढिय़ा के बेटे के पास जा स्वप्न में प्रकट हो कहने लगी- साहूकार के बेटे, सो रहा है या जागता है। वह कहने लगा- माता सोता भी नहीं, जागता भी नहीं हूं कहो क्या आज्ञा है? मां कहने लगी- तेरे घर-बार कुछ है कि नहीं? वह बोला- मेरे पास सब कुछ है मां-बाप है बहू है क्या कमी है। मां बोली- भोले पुत्र तेरी बहू घोर कष्ट उठा रही है, तेर मां-बाप उसे त्रास दे रहे हैं। वह तेरे लिए तरस रही है, तू उसकी सुध ले। वह बोला- हां माता जी यह तो मालूम है, परंतु जाऊं तो कैसे? परदेश की बात है, लेन-देन का कोई हिसाब नहीं, कोई जाने का रास्ता नहीं आता, कैसे चला जाऊं? मां कहने लगी- मेरी बात मान, सवेरे नहा धोकर संतोषी माता का नाम ले, घी का दीपक जला दण्डवत कर दुकान पर जा बैठ। देखते-देखते सारा लेन-देन चुक जाएगा, जमा का माल बिक जाएगा, साझ होते-होते धन का भारी ठेर लग जाएगा।

अब सवेरे जल्दी उठ भाई-बंधुओं से सपने की सारी बात कहता है। वे सब उसकी अनसुनी कर दिल्लगी उड़ाने लगे। कभी सपने भी सच होते हैं। एक बूढ़ा बोला- देख भाई मेरी बात मान, इस प्रकार झूंठ-सांच करने के बदले देवता ने जैसा कहा है वैसा ही करने में तेरा क्या जाता है। अब बूढ़े की बात मानकर वह नहा धोकर संतोषी माता को दण्डवत धी का दीपक जला दुकान पर जा बैठता है। थोड़ी देर में क्या देखता है कि देने वाले रुपया लाने लगे, लेने वाले हिसाब लेने लगे। कोठे में भरे सामान के खरीददार नकद दाम दे सौदा करने लगे। शाम तक धन का भारी ठेर लग गया। मन में माता का नाम ले चमत्कार देख प्रसन्न हो घर ले जाने के वास्ते गहना, कपड़ा सामान खरीदने लगा। यहां काम से निपट तुरंत घर को रवाना हुआ।

वह बेचारी जंगल में लकड़ी लेने जाती है। लौटते वक्त माताजी क मंदिर में विश्राम करती है। वह तो उसके प्रतिदिन रुकने का जो स्थान ठहरा, धूल उड़ती देख वह माता से पूछती है- हे माता, यह छूल कैसे उड़ रही है? माता कहती है- हे पुत्री तेरा पति आ रहा है। अब तू ऐसा कर लकडिय़ों के तीन बोझ बना ले, एक नदी के किनारे रख और दूसरा मेरे मंदिर पर व तीसरा अपने सिर पर रख। तेरे पति को लकडिय़ों का गट्ठर देख मोह पैदा होगा, वह यहां रुकेगा, नाश्ता-पानी खाकर मां से मिलने जाएगा, तब तू लकडिय़ों का बोझ उठाकर जाना और चौक मे गट्ठर डालकर जोर से आवाज लगाना- लो सासूजी, लकडिय़ों का गट्ठर लो, भूसी की रोटी की रोटी दो, नारियल के खेपड़े में पानी दो, आज मेहमान कौन आया है? बहुत अच्छा। माताजी से कहकर वह प्रसन्न मन से लकडिय़ों के तीन ग_र ले आई। एक नदी के किनारे पर और एक माताजी के मंदिर पर रखा। इतने में मुसाफिर आ पहुंचा। सूखी लकड़ी देख उसकी इच्छा उत्पन्न हुई कि हम यही पर विश्राम करें और भोजन बनाकर खा-पीकर गांव जाएं। इसी तरह रुक कर भोजन बना, विश्राम करके गांव को गया। सबसे प्रेम से मिला। उसी समय सिर पर लकड़ी का गट्ठर लिए वह उतावली सी आती है। लकडिय़ों का भारी बाझ आंगन में डालकर जोर से तीन आवाज देती है- लो सासूजी, लकडिय़ों का गट्ठर लो, भूसी की रोटी दो। आज मेहमान कौन आया है?

यह सुनकर उसकी सास बाहर आकर अपने दिए हुए कष्टों को भुलाने हेतु कहती है- बहु ऐसा क्यों कहती है? तेरा मालिक ही तो आया है। आ बैठ, मीठा भात खा, भोजन कर, कपड़े-गहने पहिन। उसकी आवाज सुन उसका पति बाहर आता है। अंगूठी देख व्याकुल हो जाता है। मां से पूछता है- मां यह कौन है? मां कहती है-बेटा यह तेरी बहु है। आज १२ बर्ष हो गए, जब से तू गया है तब से सारे गांव में जानवर की तरह भटकती फिरती है। घर का काम-काज कुछ करती नहीं, चार पहर आकर खा जाती है। अब तुझे देख भूसी की रोटी और नारियल के खोपड़े में पानी मांगती है। वह लज्जित हो बोला- ठीक है मां मैने इसे भी देखा और तुम्हें भी देखा है, अब दूसरे घर की ताली दो, उसमें रहूंगा। अब मां बोली-ठीक है बेटा, जैसी तेरी मरजी हो सो कर। यह कह ताली का गुच्छा पटक दिया। उसने ताली लेकर दूसरे मकान की तीसरी मंजिल का कमरा खोल सारा सामान जमाया। एक दिन में राजा के महल जैसा ठाट-बाट बन गया। अब क्या था? बहु सुख भोगने लगी।

इतने में शुक्रवार आया। उसने अपने पति से कहा- मुझे संतोषी माता के व्रत का उद्यापन करना है। उसका पति बोला -अच्छा, खुशी से कर लो। वह उद्यापन की तैयारी करने लगी। जिठानी के लड़कों को भोजन के लिए कहने गई। उन्होंने मंजूर किया परन्तु पीछे से जिठानी ने अपने बच्चों को सिखाया, देखो रे, भोजन के समय सब लो खटाई मांगना, जिससे उसका उद्यापन पूरा न हो। लड़के जीमने आए खीर खाना पेट भर खाया, परंतु बाद में खाते ही कहने लगे- हमें खटाई दो, खीर खाना हमको नहीं भाता, देखकर अरूचि होती है। वह कहने लगी- भाई खटाई किसी को नहीं दी जाएगी। यह तो संतोषी माता का प्रसाद है। लड़के उठ खड़े हुए, बोले- पैसा लाओ, भोली बहु कुछ जानती नहीं थी, उन्हें पेसे दे दिए। लड़के उसी समय हठ करके इमली खटाई ले खाने लगे। यह देखकर बहु पर माताजी ने कोप किया। राजा के दूत उसके पति को पकड़ कर ले गए। जेठ जेठानी मन-माने वचन कहने लगे। लूट-लूट कर धन इकठ्ठा कर लाया है, अब सब मालूम पड़ जाएगा जब जेल की मार खाएगा।

बहु से यह वचन सहन नहीं हुए। रोती हुई माताजी के मंदिर गई, कहने लगी- हे माता, तुमने क्या किया, हंसा कर अब भक्तों को रुलाने लगी? माता बोली- बेटी तूने उद्यापन करके मेरा व्रत भंग किया है। इतनी जन्दी सब बातें भुला दी? वह कहने लगी- माता भूलती तो नहींं, न कुछ अपराध किया है, मैने तो भूल से लड़कों को पैसे दे दिए थे, मुझे क्षमा करो। मै फिर तुम्हारा उद्यापन करूंगी। मां बोली- अब भूल मत करना। वह कहती है- अब भूल नहीं होगी, अब बतलाओ वे कैसे आवेंगे? मां बोली- जा पुत्री तेरा पति तुझे रास्ते में आता मिलगा। वह निकली, राह में पति आता मिला। वह पूछती है- तुम कहां गए थे? वह कहने लगा- इतना धन जो कमाया है उसका टैक्स राजा ने मांगा था, वह भरने गया था। वह प्रसन्न हो बोली- भला हुआ, अब घर को चलो।

घर गए, कुछ दिन बाद फिर शुक्रवार आया। वह बोली- मुझे फिर माता का उद्यापन करना है। पति ने कहा- करो। बहु फिर जेठ के लड़कों को भोजन को कहने गई। जेठानी ने एक दो बातें सुनाई और सब लड़कों को सिखाने लगी। तुम सब लोग पहले ही खटाई मांगना। लड़के भोजन से पहले कहने लगे- हमे खीर नहीं खानी, हमारा जी बिगड़ता है, कुछ खटाई खाने को दो। वह बोली- खटाई किसी को नहीं मिलेगी, आना हो तो आओ, वह ब्राह्मण के लड़के लाकर भोजन कराने लगी, यथा शक्ति दक्षिणा की जगह एक-एक फल उन्हें दिया। संतोषी माता प्रसन्न हुई।

माता की कृपा होते ही नवें मास में उसके चन्द्रमा के समान सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र को पाकर प्रतिदिन माता जी के मंदिर को जाने लगी। मां ने सोचा- यह रोज आती है, आज क्यों न इसक घर चलूं? इसका आसरा देखू तो सही। यह विचार कर माता ने भयानक रूप बनाया, गुड़-चने से सना मुख, ऊपर सूंड के समान होठ, उस पर मक्खियां भिन-भिन कर रही थी। देहली पर पैर रखते ही उसकी सास चिल्लाई- देखो रे, कोई चुडैल डाकिन चली आ रही है, लड़कों इसे भगाओ, नहीं तो किसी को खा जाएगी। लड़के भगाने लगे, चिल्लाकर खिड़की बंद करने लगे। बहु रौशनदान में से देख रही थी, प्रसन्नता से पगली बन चिल्लाने लगी- आज मेरी माता जी मेरे घर आई है। वह बच्चे को दूध पीने से हटाती है। इतने में सास का क्रोध फट पड़ा। वह बोली-रांड देखकर क्या उतावली हुई है? बच्चे को पटक दिया। इतने में मां के प्रताप से लड़के ही लड़के नजर आने लगे। वह बोली- मां मै जिसका व्रत करती हूं यह संतोषी माता है। इतना कहकर झट से सारे किवाड़ खोल दिए।

सबने माता जी के चरण पकड़ लिए और विनती कर कहने लगे- हे माता, हम मूर्ख हैं, अज्ञानी हैं, तुम्हारे व्रत की विधि हम नहीं जानते, व्रत भंग कर हमने बड़ा अपराध किया है, जग माता आप हमारा अपराध क्षमा करो। इस प्रकार माता प्रसन्न हुई। बहू को प्रसन्न हो जैसा फल दिया, वैसा माता सबको दे, जो पढ़े उसका मनोरथ पूर्ण हो।

बोलो संतोषी की माता की जय।

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

नवरात्रि व्रत की महिमाकौशल

 (पुराण: वेद और पुराण हिंदू धर्म की अमूल्य निधि हैं। पुराण ज्ञान और शिक्षा के साथ मनोरंजन का भी भरपूर खजाना है। यही कारण है कि लोग इसे आज के समय में भी पढ़ना पसंद करते हैं। जन्म से मृत्यु तक के हमारे संस्कार इन्हीं वेदों और पुराणों की परंपरा पर आधारित हैं। पुराणों की संख्या अठ्ठारह कही गई है। इनमें विभिन्न व्यक्तियों, वस्तुओं, जीवों आदि को आधार बनाकर शिक्षा और ज्ञान का महत्व बताया गया है। कहानियों-कथाओं के जरिए सही और गलत में अंतर बताया गया है। )
नवरात्रि व्रत की महिमाकौशल 
देश में सुशील नामक का एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। प्रतिदिन मिलने वाली भिक्षा से वह अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। उसके कई बच्चे थे। प्रातःकाल वह भिक्षा लेने घर से निकलता और सायंकाल लौट आता था। देवताओं, पितरों और अतिथियों की पूजा करने के बाद आश्रितजन को खिलाकर ही वह स्वयं भोजन ग्रहण करता था। इस प्रकार भिक्षा को वह भगवान का प्रसाद समझकर स्वीकार करता था।इतना दुःखी होने पर भी वह दूसरों की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहता था। यद्यपि उसके मन में अपार चिंता रहती थी, तथापि वह सदैव धर्म-कर्म में लगा रहता था। अपनी इन्द्रियों पर उसका पूर्ण नियंत्रण था। वह सदाचारी, धर्मात्मा और सत्यवादी था। उसके हृदय में कभी क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या जैसे तुच्छ विकार उत्पन्न नहीं होते थे।
एक बार उसके घर के निकट सत्यव्रत नामक एक तेजस्वी ऋषि आकर ठहरे। वे एक प्रसिद्ध तपस्वी थे। मंत्रों और विद्याओं का ज्ञाता उनके समान आस-पास दूसरा कोई नहीं था। शीघ्र ही अनेक व्यक्ति उनके दर्शनों को आने लगे। सुशील के हृदय में भी उनसे मिलने की इच्छा जागृत हुई और वह उनकी सेवा में उपस्थित हुआ। सत्यव्रत को प्रणाम कर वह बोला-“ऋषिवर! आपकी बुद्धि अत्यंत विलक्षण है। आप अनेक शास्त्रों, विद्याओं और मंत्रों के ज्ञाता हैं। मैं एक निर्धन, दरिद्र और असहाय ब्राह्मण हूँ। कृपया मुझे बताएँ कि मेरी दरिद्रता किस प्रकार समाप्त हो सकती है?” सत्यव्रत ने आगे कहा कि, “मुनिवर! आपसे यह पूछने का केवल इतना ही अभिप्राय है कि मुझ में कुटुम्ब का भरण-पोषण करने की शक्ति आ जाए। धनाभाव के कारण मैं उन्हें समुचित सुविधाएँ और अन्य सुख नहीं दे पा रहा हूँ। दयानिधान! तप, दान, व्रत, मंत्र अथवा जप-आप कोई ऐसा उपाय बताने का कष्ट करें, जिससे कि मैं अपने परिवार का यथोचित भरण-पोषण कर सकूँ। मुझे केवल इतने ही धन का अभिलाषा है, जिससे कि मेरा परिवार सुखी हो जाए।”
सत्यव्रत ने सुशील को भगवती दुर्गा की महिमा बताते हुए नवरात्रि व्रत करने का परामर्श दिया। सुशील ने सत्यव्रत को अपना गुरु बनाकर उनसे मायाबीज नामक भुवनेश्वरी मंत्र की दीक्षा ली। तत्पश्चात नवरात्रि व्रत रखकर उस मंत्र का नियमित जप आरम्भ कर दिया। उसने भगवती दुर्गा की श्रद्धा और भक्तिपूर्वक आराधना की। नौ वर्षों तक प्रत्येक नवरात्रि में वह भगवती दुर्गा के मायाबीज मंत्र का निरंतर जप करता रहा। सुशील की भक्ति से प्रसन्न होकर नवें वर्ष की नवरात्रि में, अष्टमी की आधी रात को देवी भगवती साक्षात प्रकट हुईं और सुशील को उसका अभीष्ट वर प्रदान करते हुए उसे संसार का समस्त वैभव, ऐश्वर्य और मोक्ष प्रदान किया। इस प्रकार भगवती दुर्गा ने प्रसन्न होकर अपने भक्त सुशील के सभी कष्टों को दूर कर दिया और उसे अतुल धन-सम्पदा, मान-सम्मान और समृद्धि प्रदान की।
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी कार्य को श्रद्धा, भक्ति और निष्ठा से करने पर उसका फल सदैव अनुकूल ही प्राप्त होता है।

गुरुवार, 19 मार्च 2009

तीन गुणों का बेलेंस केवल नौ दिन में

चैत्र (वसंत ऋतु) की नवरात्रि घट स्थापना २७ मार्च को होगी। एक बार फिर अपने अच्छे बुरे गुणों के सामंजस्य का मौका सबको मिलेगा। नवरात्रि के नौ दिन तीन मौलिक गुणों से बने इस ब्रह्मांड में आनंदित रहने का भी एक अवसर हैं। यद्यपि हमारा जीवन इन तीन गुणों के द्वारा ही संचालित है। फिर भी हम उन्हें कम ही पहचान पाते हैं या उनके बारे में विचार भी बहुत कम ही कर पाते हैं। वस्तुत: नवरात्रि के पहले तीन दिन तमोगुण के हैं। दूसरे तीन दिन रजोगुण के और आखिरी तीन दिन सत्व गुण के लिए हैं। हमारी चेतना इन तमोगुण और रजोगुण के बीच बहती हुई सतोगुण के आखिरी तीन दिनों में खिल उठती है। चेतना के इस उत्सवधर्मी उदय से हमारे जीवन में सत्व का विस्तार होता है और जब भी जीवन में सत्व बढता है, तब हमें विजय मिलती है। इस ज्ञान का सारतत्व जश्न के रूप में दसवें दिन विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है। यह तीन मौलिक गुण हमारे भव्य ब्रह्मांड की स्त्री शक्ति माने गए हैं। नवरात्रि के दौरान देवी मां की पूजा करके हम त्रिगुणों में सामंजस्य लाते हैं और वातावरण में सत्व के स्तर को बढाते हैं।

नवरात्रि का त्योहार आश्विन (शरद ऋतु) की शुरुआत में और चैत्र (वसंत ऋतु) की शुरुआत में प्रार्थना और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह काल आत्मनिरीक्षण और अपने स्त्रोत की ओर वापस जाने का समय होता है। परिवर्तन के इस काल के दौरान, प्रकृति भी पुराने को झाड कर नवीन हो जाती है। शीत ऋतु में कई जानवर शीत निद्रा में चले जाते हैं और वसंत के मौसम में जीवन वापस नए सिरे से खिल उठता है।
वैदिक विज्ञान के अनुसार, पदार्थ अपने मूल रूप में वापस आकर फिर से बार-बार अपनी रचना करता है। यह सृष्टि सीधी रेखा में नहीं चल रही है, बल्कि वह चक्रीय है। प्रकृति के द्वारा सभी कुछ का पुनर्नवीनीकरण हो रहा है। कायाकल्प की यह एक सतत प्रक्रिया है। फिर भी सृष्टि के इस नियमित चक्र से मनुष्य का मन पीछे छूटा हुआ है। नवरात्रि का त्योहार अपने मन को वापस अपने स्त्रोत की ओर ले जाने के लिए है।
उपवास, प्रार्थना, मौन और ध्यान के माध्यम से जिज्ञासु अपने सच्चे स्त्रोत की ओर यात्रा करता है। रात को भी रात्रि कहते हैं। क्योंकि वह भी नवीनता और ताजगी लाती है। वह हमारे अस्तित्व के तीन स्तरों पर राहत देती है-स्थूल शरीर को, सूक्ष्म शरीर को और कारण शरीर को।
उपवास के द्वारा शरीर तमाम तरह के विषाक्त पदार्थो से मुक्त हो जाता है। मौन के द्वारा हमारे वचनों में शुद्धता आती है और बातूनी मन शांत होता है तथा ध्यान के द्वारा अपने अस्तित्व की गहराइयों में डूबकर हमें आत्म साक्षात्कार मिलता है। यह आंतरिक यात्रा हमारे बुरे कर्मो को समाप्त करती है। नवरात्रि अपने मूल रूप में आत्मा अथवा प्राण का उत्सव है। इसके द्वारा ही महिषासुर (अर्थात् जडता), शुम्भ-निशुम्भ (गर्व और शर्म) और मधु-कैटभ (अत्यधिक राग-द्वेष) को नष्ट किया जा सकता है। वे एक दूसरे से पूर्णत: विपरीत हैं, फिर भी एक दूसरे के पूरक हैं। जडता, गहरी नकारात्मकता और मनोग्रस्तियां (रक्तबीजासुर), बेमतलब का वितर्क (चंड-मुंड) और धुंधली दृष्टि (धूम्रलोचन) को केवल प्राण और जीवन शक्ति ऊर्जा के स्तर को ऊपर उठाकर ही दूर किया जा सकता है।
हालांकि नवरात्रि बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाई जाती है। परंतु वास्तविकता में यह लडाई अच्छे और बुरे के बीच में नहीं है। वेदांत की दृष्टि से यह द्वैत पर अद्वैत की जीत है। जैसा कि अष्टावक्र ने कहा था, बेचारी लहर अपनी पहचान को समुद्र से अलग रखने की लाख कोशिश करती है, लेकिन कोई लाभ नहीं होता।
हालांकि इस स्थूल संसार के भीतर ही सूक्ष्म संसार समाया हुआ है। लेकिन उनके बीच भासता अलगाव की भावना ही द्वंद्व का कारण है। एक ज्ञानी के लिए पूरी सृष्टि जीवंत है। जैसे बच्चों को सभी चीजों में जीवन होने का आभास होता है, ठीक उसी प्रकार उसे भी सब में जीवन दिखता है। देवी मां या शुद्ध चेतना ही सब नाम और रूप में व्याप्त हैं। हर नाम और हर रूप में एक ही देवत्व को जानना ही नवरात्रि का उत्सव है। अत: आखिर के तीन दिनों के दौरान विशेष पूजाओं के द्वारा जीवन और प्रकृति के सभी पहलुओं का सम्मान किया जाता है।
काली मां प्रकृति की सबसे भयानक अभिव्यक्ति हैं। प्रकृति सौंदर्य का प्रतीक है, फिर भी उसका एक भयानक रूप भी है। इस द्वैत के यथार्थ को मान लेने से मन में एक स्वीकृति आ जाती है और मन को आराम मिलता है।
देवी मां को सिर्फ बुद्धि के रूप में नहीं जाना जाता, बल्कि भ्रांति के रूप में भी उन्हें जाना जाता है। वह न सिर्फ लक्ष्मी (समृद्धि) हैं, बल्कि वह भूख (क्षुधा) भी और प्यास (तृष्णा) भी हैं। संपूर्ण सृष्टि में देवी मां के इस दोहरे पहलू को पहचान लेने के बाद एक गहरी समाधि लग जाती है। यह पश्चिम में सदियों से चले आ रहे धार्मिक संघर्ष का भी एक उत्तर है। ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म के द्वारा अद्वैत सिद्धि प्राप्त की जा सकती है अथवा इस अद्वैत चेतना में पूर्णता की स्थिति प्राप्त की जा सकती है।

(शास्त्रों और संतों की वाणी से साभार )

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

साधना की सफलता और सिद्धि प्राप्ति

ऐसा लगता है लोगों ने ईश्वर उपासना, पूजा-पाठ, जप-तप और सांसारिक प्रलोभनों को ही साधना बना लिया है। उनका उद्देश्य किसी प्रकार धन प्राप्त करना होता है। ऐसे लोगों को प्रथम तो उपासनाजनितशक्ति ही प्राप्त नहीं होती और किसी कारणवश थोडी बहुत सफलता प्राप्त हो गई तो वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है और आगे के लिए रास्ता बंद हो जाता है। देवी शक्तियां कभी किसी अयोग्य व्यक्ति को ऐसी साम‌र्थ्य प्रदान नहीं कर सकती, जिससे वह दूसरों का अनिष्ट करने लग जाए।

उपासना प्रारंभ करते ही साधक की अंत:प्रक्रियामें तेजी से परिवर्तन प्रारंभ होते हैं। जिस प्रकार आग पर चढे कडाहेमें जब तक आंच नहीं लगती, तब तक उसमें भरे जल में कोई हलचल दिखाई नहीं देती, किंतु जैसे-जैसे आग तेज होती है जल में हलचल, उबलना, खौलना, भाप बनना सब प्रारंभ हो जाता है। उसी प्रकार साधना की आंच से भी विचार मंथन और आत्मिक जगत में हलचल प्रारंभ होती है। उसके बाद शनै:-शनै:ऐसे लक्षण प्रकट होने प्रारंभ हो जाते हैं जिन्हें साधना की सफलता और सिद्धि प्राप्ति के लक्षण कह सकते हैं।
यह उपलब्धि चर्चित नहीं होनी चाहिए, अन्यथा साधक का अहंकार बढेगा और वह पथ भ्रष्ट होगा। किंतु उन्हें अनुभव कर सफलता के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है। दूसरों का वैभव बढाने में आत्मशक्ति का सीधा प्रत्यावर्तन करना अपनी शक्तियों को समाप्त करना है।